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परमेश्‍वर शास्‍त्र

I. परमेश्‍वर का अस्तित्‍व सृष्टि-मूलक तर्क: यदि जगत है, तो जगत एक सृष्टि है। यदि वह सृष्टि नही तो अनंतता के लक्षण होते, जो नही है। अर्थात जगत की सृष्टि एक अनंत परमेश्‍वर ने ही किया। II. परमेश्‍वर का स्‍वभाव परमेश्‍वर अपने अस्तित्‍व, बुद्धि, सामर्थ, पवित्रता, न्‍याय, भलाई, एवं सत्‍य में आत्‍मा है, अपरिमित है, अनंत है, अपरिवर्तनीय है III. परमेश्‍वर के गुण a. परमेश्‍वर के आंतरिक गुण (Unrelated Attributes) (i) आत्‍मा (John 4:24) (ii) अपरिमित – विराट (1 Kgs. 8:27), अनंत (Exo. 15:18; Deu. 33:27) (iii) अद्वैत (Exo. 20:3; Deu. 4:35,39. 1 Sam. 2:2; 1 Ti. 1:17) b. परमेश्‍वर के सांबंधिक गुण – संसार के संबंध में (i) सर्वसामर्थी (Gen. 1:1; Gen. 17:1; Job. 40:2; Amo. 4:13; Mat. 19:26) (ii) सर्वोपस्थित (Gen. 28:15-16; Psa. 139:7-10) (iii) सर्वज्ञानी (Gen. 18:18-19); 2 Kgs. 8:10-13; Jer. 1:4-5; Rom. 8:27-29. 1 Pet. 1:2) (iv) बुद्धिमान (Psa. 104:24; Pro. 3:19; Jer. 10:12; Dan. 2:20-21; Col. 2:2-3) (v) सार्वभौम (Dan. 4:35; Mat. 20:15; Rom. 9:21) c. नैतिक प्राणियों के संबंद्ध में (i) पवित्र (Exo. 15:11;...