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परिणयगाथा - अध्‍याय 1 - प्रेम का प्रमोद

प्रेम का प्रमोद ‘वह अपने मुंह के चुम्ब नों से मुझे चूमे ! क्‍योंकि तेरा प्रेम दाखमधु से उत्तम है’ (श्रेष्ठ गीत 1:2) यहूदियों की रीतिरिवाज के अनुसार विवाहोपरान्तउ अंगीकार स्व रूप पति पत्नी  एक दूसरे का चुम्ब)न लेते थे। इस चुम्बिन का अर्थ विवाह में एक दूसरे को ग्रहण किये जाने का साक्ष्यि माना जाता था जो अति आवश्यइक होता था। ‘वह अपने मुंह के चुम्बानों से मुझे चूमे ! यह प्रेयसी का अपने प्रेमी के प्रति प्रेम तथा समर्पण को दर्शाता है। चुम्बतन आपस में मेल का बोध है और परस्पसर सहभागिता को दर्शाता है। इन अन्तिम दिनों में परमेश्वनर हमसे किस प्रकार निकटता से बातें करता है तथा परस्पगरता प्रगट करता है। ‘तेरा प्रेम दाखमधु से उत्तम है’ दाखमधु आनन्द  का प्रतीक है। ईश्वकरीय प्रेम से ही वास्ताविक आनन्दर प्राप्तब होता है। दाखमधु का तो मूल्यु है परन्तु  परमेश्वर के प्रेम का कोई मूल्य  नहीं और न ही हमें इसे प्राप्त करने के लिए कुछ खर्च करना पड़ता है और न ही पड़ा था। दाखमधु की एक और बात यह कि यह खट्टा भी हो जाता है, परन्तु मसीह के प्रेम में कभी कोई खट्टापन नहीं आता।

श्रेष्‍ठगीत - सार

श्रेष्‍ठगीत  का सार कुरियन थामस  पलश्‍ तीन देश के उत्‍ तरी भाग में गिलबोहा  प र्वत के सामने  इस्‍ साकार गोत्र के  स्‍ थान पर सुनेम ( शुलेम ) नामक एक गांव था। कार्मेल पर्वत से सोलह मील दूरी पर स्थित इस गांव की एक रूपवती युवती ( शूलेमन ) भेड़ बकरियां चराती थी। जब वह भेड़ बकरियां चराने के कार्य में   व्‍यस्‍त   थी तभी उसकी भेंट एक गडरिये से हुई। बस पहिली ही भेंट में गडरिये ने शुलेमी के हृदय में प्रेम के बीज बो दिये। प् ‍ यार के बीजों में अंकु फूटे और वे दोनों एक दूसरे को इतना चाहने लगे कि एक दूसरे के बिना उनका रहना मुश्किल हो गया। उन्‍ होंने परिणयबंधन का निर्णय किया। ऐसे मधुर बंधन के इन् ‍ तजार में जब यह युवती अपना समय बिता रही थी तभी राजा सुलेमान उस स्थान से गुजरे। राजा सुलेमान के अभिवादन में गीत गाने के लिए कुछ तरूण युवतियां एकत्र हुई जिनमें यह युवती भी थी। अन् ‍ य अनेक युवतियों के बीच में घिरी इस सांवली युवती शुलेमी की सुन् ‍ दरता पर ...

कुरियन थामस - परिणयगाथा - प्रवेशिका

प्रवेशिका श्रेष्‍ठगीत पुस्‍तक की रचना इस्राएल के मधुर गायक राजा दाउद के पुत्र राजा सुलेमान द्वारा हुई। इस पुस्‍तक पर काव्‍य रूप में ये शब्‍द उचित बैठते हैं: ‘वाक्‍यम रसात्‍मक काव्‍यम’। अपने पिता दाउद के रसात्‍मक काव्‍य का प्रभाव सुलेमान पर बाल्‍यकाल से ही पड़ चुका था। इस पुसतक की काव्‍यात्‍मकता और साहित्यिक रस को बढ़ाने में ईश्‍वरीय ज्ञान और प्रेरणा का सुलेमान के जीवन में अनुपम प्रभाव पाया जाता है। सम्‍पूर्ण पुस्‍तक असंख्‍य आत्मिक शिक्षाओं और प्रेरणाओं से भरी पड़ी है जो कि साहितियक दृष्टि से अमूल्‍य है। साहित्‍य प्रेमियों ने यदि इस पुस्‍तक को नहीं पढ़ा है तो उनके लिए एक बड़ी हानि है। प्राचीन से ही देखा गया है कि पत्रकारिता में विद्धता हासिल करने वालों तथा अन्‍य लेखकों ने भी श्रेष्‍ठगीत पुस्‍तक का अच्‍छा अघ्‍ययन किया। हमारे महाविधालय में तो अग्रेजी साहित्‍य पढने वाले शिक्षक विघाथियों को सलाह दिया करते थे कि सम्‍पुर्ण बाइबिल की एक एक प्रति अपने पास रखें तथा रखें तथा उसे घ्‍यान से पुरा पढे। शयद यही कारण है कि आज भारत से भी अनेक अन्‍य धर्मावलम्‍बी भी बाइबिल का अच्‍छा ज्ञान रखते है। भ्‍ले व...